जिन्दगी के रंग – 223

आपने अपने आप को आईने में देखा ज़िंदगी भर।

एक दिन ज़िंदगी के आईने में प्यार से मुस्कुरा कर निहारो अपने आप को।

अपने को दूसरों की नज़रों से नहीं, अपने मन की नज़रों से देखा। कहो, प्यार है आपको अपने आप से!

सिर्फ़ दूसरों को नहीं अपने आप को खुश करो।

रौशन हो जाएगी ज़िंदगी।

जी भर जी लो इन पलों को।

फिर नज़रें उठा कर देखो। जिसकी थी तलाश तुम्हें ज़िंदगी भर,

वह मंज़िल-ए-ज़िंदगी सामने है। जहाँ लिखा है सुकून-ए-ज़िंदगी – 0 किलोमीटर!

ज़िंदगी के रंग- 218

ज़िंदगी के रंग – 217

ज़िंदगी के देखे कई रंग,

कई बसंत !

सतरंगी ज़िंदगी ने सिखाया बहुत कुछ।

कभी हँसाया कभी रुलाया।

आज जहाँ खड़े हैं,

आप सब के साथ ।

वह है उम्र किस्टलाइस्ड इंटेलिजेन्स का,

अनुभव और समझदारी की वह उम्र जहाँ बस चाहत है,

खुश रहने की!

खट्टी-मीठी ज़िंदगी की राहों को ख़ुशियों के साथ तय करने की।

अब दुनिया और काम में

वक्त के साथ छूटते, भूलते जा रहे अपनों के साथ

बैठ कर वक्त भूलने की चाहत है।

ज़िंदगी के रंग – 222

ज़िंदगी की राहों में लोग

रूठते-छूटते रहते हैं।

कुछ अपनों के अपना होने के

भ्रम टूटते रहतें हैं।

अँधेरे पलों में कुछ सच्चे अपने,

दमकते सितारों से,

ज़िंदगी में जुटते रहतें हैं।

ज़िंदगी के रंग – 214

ख़्वाब था, ख़्वाहिशें थीं या हक़ीक़त …. मालूम नहीं!

लगता था जैसे जागती अँधेरी रातों में,

नींद आते कोई आ बैठा पायताने, सहलाता तलवों को.

जहाँ उग आए थे फफोले, ज़िंदगी के दौड़ में भागते-दौड़ते .

दर्द देते,  फूट गए थे कुछ छाले…. फफोले…… .

क्या जागती ज़िंदगी में भी कोई मलहम लगाने आएगा?

ज़िंदगी के रंग -211

 

 

 

 

बादलों और धूप को लड़ते देखा ।

रात की ख़ुशबू में,

खुली आँखों और सपनों को झगड़ते देखा।

फ़ूल और झड़ती पंखुड़ियों को,

हवा के झोंकों से ठहरने कहते देखा।

अजीब रुत है।

हर कोई क्यों दूसरे से नाख़ुश है?

ज़िंदगी के रंग – 210

हाँथों  में खोजते रहे

अरमानों अौ ख़्वाबों की लकीरों को,

और वे लकीरें उभर आईं पेशानी….माथे पर,

अनुभव की सलवटें बन कर।

मेरी कविता संग्रह-किताब के रुप में

“ज़िंदगी के रंग”   my poem book

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इस नाम से, बरसों से मैं कविताएं लिखती आ रही हूँ। मेरे लिये खुशी की बात है कि मुझे अपनी कविताओं को पुस्तक रूप देने का अवसर मिला। इस किताब में मैंने अपनी नई कविताओं के साथ कुछ पुरानी कविताएं भी डाली है। आशा है, आप लोगों को यह कविता संग्रह पसंद आएगी। आप इसे नीचे दिए गए लिंक पर पढ़ सकते हैं और अगर चाहे, अब आप इसे दिए गए पब्लिकेशन लिंक पर ऑर्डर भी कर सकते हैं। अगर आप में से कोई मेरी इस किताब का रिव्यू करना चाहे तो मुझे बताएं। मुझे इससे बड़ी खुशी होगी।

इस पुस्तक के छपने की यात्रा में मदद के लिए आशीष/ शैंकी, रिव्यू लिखने के लिए स्मिता सहाय पुस्तक के कवर पृष्ठों पर तस्वीरों के लिए चांदनी सहाय की तहे दिल से आभारी हूं।

 

 

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ज़िंदगी के रंग -200

  ज़िंदगी बङी  सख़्त और ईमानदार गुरु है.

अलग-अलग तरीक़े से पाठ पढ़ा कर इम्तिहान लेती है…..

और तब तक लेती है,

जब तक सबक़ सीख ना जाओ.

अभी का परीक्षा कुछ नया है.

रिक्त राहें हैं, पर चलना नहीं हैं.

अपने हैं लेकिन मिलना नहीं है.

पास- पड़ोस से घुलना मिलना नहीं है.

इस बार,

अगर सीखने में ग़लती की तब ज़िंदगी पहले की तरह पाठ दुहराएगी नहीं …

और फिर किसी सबक़ को सीखने की ज़रूरत नहीं रह जाएगी.

कोरोना के टेस्ट में फ़ेल होना हीं पास होना है.

पर किसी के पास-पास नहीं होना है.

ज़िंदगी के रंग- 199

ज़िंदगी की परेशान घड़ियों में अचानक

किसी की बेहद सरल और सुलझी बातें

गहरी समझ और सुकून दे जातीं हैं, मलहम की तरह।

किसी ने हमसे कहा – किसी से कुछ ना कहो, किसी की ना सुनो !

दिल से निकलने वाली बातें सुनो,

और अपने दिल की करो।

गौर से सुना,  पाया……

दिल के धड़कन की संगीत सबसे मधुर अौर सच्ची है।

 

ज़िंदगी के रंग – 80

हौसले जीत से नहीं बढ़ते .

परेशानियों से डरे बिना ,

उन को हराने से बढ़ते हैं .

ज़िंदगी में हमें दूसरों को हराने की नहीं

अपने आप से जीतने से आदत होनी चाहिये.

 

यह कविता किसी अपने के लिये जो दिल के बहुत करीब है।

Image courtesy – Monica