खुले दरवाजे, शीशे की अजनबी दीवारें, खिड़कियाँ

आसमान छूने की चाहत छोड़,

कैद कर लिया है अपने को,

अपनी जिंदगी को,

खुले दरवाजे और शीशे की कुछ अजनबी दीवारों, खिड़कियों में।

जैसे बंद पड़ी किताबें,

कांच की अलमारी से झांकती हैं अपने को महफ़ुज मान,

पन्नों में अपनी दास्तानों को कैद कर।

अब खाली पन्नों पर,

अपने लफ्ज़ों को उतार

रश्म-ए-रिहाई की नाकाम कोशिश कर रहें हैं।

Painting courtesy- Lily Sahay.

बिखरती खुशबू

बिखरती खुशबू को समेटने

की चाहत देख सुगंध ने कहा –

हमारी तो फितरत हीं है बिखरना

हवा के झोंकों के साथ।

तुमने बिखर कर देखा है कभी क्या ?

इस दर्द में  भी आनंद है।

 

चाहत -कविता

गर चाहत हो, ईमानदारी हो,

कमजोर की हिफाजत में भी चीजें  महफूज रह सकती हैं

जैसे मिट्टी के गुल्लक में

 लोहे के सिक्के