थोड़ी बहुत

इंसानों का यह हाल? बेटियाँ थीं ?

या नाजायज़ थे? भूल क्यों जातें हैं कि इंसान थे।

जब सीखा नहीं थोड़ी बहुत भी इंसानियत,

फिर क्यों जा रहें हैं मंगल और चाँद पर?

धरती हीं काफ़ी नहीं ऐसे मज़ाकों के लिए?

तय है मामले की तहक़ीक़ात के आदेश दिए जाएँगें।

सच्चाई सामने आएगी या बहानें?

जैसे – फ़र्मेंलिन में डूबे स्पेसिमेन।

या किसी निरीह को बकरा बनाएँगे?

समय भी शर्मिंदा होगा,

घड़ों में सौ कौरवों ने जन्म लिया,

आज नालों-बोतलों में जन्म से पहले मौत?

http://कर्नाटकः नाले में तैरते मिले बोतल में बंद 7 भ्रूण, बेलगावी जिले की शर्मनाक घटना

http://7 Aborted Fetuses Sound in Canister in Karnataka in Case of Sex Detection

चाँद और सितारे

जब अपनी चाँदी सी सुकून भरी चाँदनी भर देता हैं चाँद,

खुली खिड़कियों से कमरे में।

तब हम अक्सर गुफ़्तगू करते हैं चाँद और सितारों से।

वातायन से झाँकता चाँद हँस कर कहता है,

दूरियाँ-नज़दीकियाँ तो मन की बातें है।

कई बार लोग पास हो कर भी पास नहीं होते।

रिश्तों में बस शीतलता, सुकून और शांति होनी चाहिए।

देखो मुझे, जीवन में घटते-बढ़ते तो हम सब रहते हैं।

मुस्कुरा कर सितारों ने कहा हैं-

याद है क्या तुम्हें?

हमें टूटते देख दुनिया अपनी तमन्नाएँ औ ख़्वाहिशें

पूरी होने की दुआएँ माँगती है, हमारा टूटना नहीं देखती।

फिर भी हम टिमटिमाते-खिलखिलाते रहते हैं।

कभी ना कभी सभी टूटते औ आधे-अधूरे होते रहतें हैं।

बस टिमटिमाते रहो, रौशनी और ख़ुशियाँ बाँटते रहो।

क्योंकि सभी मुस्कुराहटों और रौशनी की खोज़ में है।

चाँद

चाँद, कई बार तुम आइने से लगते हो।

जिसमें अक्स झलक रहा हो अपना।

तुम्हारी तरह हीं अकेले,

अधूरे-पूरे और सुख-दुःख के सफ़र में,

दिल में कई राज़ छुपाए,

अँधेरे में दमकते,

अपने पूरे होने के आस में रौशन हैं।

ज़िंदगी के रंग – 229

ख़ुशियों के खोज़ में

गुज़रती जा रही है ज़िंदगी।

कितनी गुजारी यादों में

कितनी कल्पना में ?

है क्या हिसाब?

ग़र आधी ज़िंदगी गुज़ारी

अतीत के साये में

और भविष्य की सोंच में।

फिर कैसे मिलेगी ख़ुशियाँ ?

और कहते है –

चार दिनों की है ज़िंदगी,

चार दिनों की है चाँदनी ।

Wandering mind not a happy mind ( A research result)

Harvard psychologists Matthew A. Killingsworth and Daniel T. Gilbert used a special “track your happiness” iPhone app to gather research. The results: We spend at least half our time thinking about something other than our immediate surroundings, and most of this daydreaming doesn’t make us happy.

About 47% of waking hours spent thinking about what isn’t going on.

https://news.harvard.edu/gazette/story/2010/11/wandering-mind-not-a-happy-mind/

तन्हाई

चाँद झुका,

खुले वातायन से

झाँक मुस्कुराया।

बोला, हमें लगता था

हम हीं अकेले दमकते हैं।

यहाँ तो और भी है,

कोई तनहा, तन्हाई

में मुस्कुरा रहा है।

बे-लौस मोहब्बत

चाँद को रोशन

करता है सूरज,

ख़ुद को जला-तपा कर,

अनंत काल से ।

क्या इंतज़ार है उसे,

कभी तो मिलन होगा?

नहीं, आफ़ताब को मालूम,

मिलन नहीं होगा कभी।

फिर भी जल रहा है…….

बे-लौस, निस्वार्थ मोहब्बत में ।

मिथ्यारहित सत्य

मिथ्यारहित सत्य

चाँद को चाँद कह दिया,

ख़फ़ा हो गई दुनिया ।

जब सच का आईना

सामने आया।

सौ-सौ झूठों का

क़ाफ़िला सजा दिया।

ना खुद से ना खुदा से

बोलना सच।

और कहते हैं जीवन का

अंतिम पड़ाव है सच ….

….. मिथ्यारहित सत्य।

रौशनी

रौशनी

सूरज डूबेगा नहीं,

तब निकलेगा कैसे?

चाँद अधूरा नहीं होगा,

तब पूरा कैसे होगा?

अँधेरा नहीं होगा,

तब रौशनी का मोल कैसे होगा?

अमावस नहीं होगा,

तब पूर्णिमा कैसे आएगी।

यही है ज़िंदगी।

इसलिय ग़र चमक कम हो,

रौशनी कम लगे।

बिना डरे इंतज़ार करो।

फिर रौशन होगी ज़िंदगी।

दाग़दार चाँद!!

दाग़दार चाँद नहीं

किसी को कहता

अपनी ओर देखने ।

आँखें खुदबखुद

निहारतीं हैं।

उसका आकर्षण देख,

चकोर ताक़त है चाँद को।

सागर की लहरें ,

पूनम की रात के

शीतल चाँद को

छूने के लिए

हिलोरे मारती हैं।

अपने में जीवन का

गूढतम रहस्य छुपाए चाँद

घटता और बढ़ता रहता है।

क्योंकि उसे मालूम है

कि अपूर्णता के बाद हीं

पूर्णता मिलती है।

चाँद

हँस कर चाँद ने कहा –

यूँ गौर से ना देखो मुझे।

ज़िंदगी ऐसी हीं है।

सिर्फ़ मेरा हीं नहीं,

हर किसी का स्याह

समय आता है।

पर सबसे अच्छी बात है,

अपने आप को पूर्ण

करने की कोशिश

में लगे रहना !!