गुफ़्तगू अपने आप से

दुनिया से नाराज़ होना छोड़ दिया अरसे पहले।

अब अपने आप से भी नाराज़ नहीं होते।

बात ऐसी नहीं कि ज़िंदगी हसीन हो गई है।

बात बस इतनी है कि

मुहब्बत करने लगे हैं अपने-आप से।

ख़ुशी की बात हो, कि ग़मों की,

सब से पहले, गुफ़्तगू अपने आप से करते हैं।

हौसला अफजाई अपने आप की करते हैं।

Positive Psychology –

Our most important relationship

is with our inner voice- Our internal

monologue shapes mental wellbeing,

says psychologists.

चाँद और सितारे

जब अपनी चाँदी सी सुकून भरी चाँदनी भर देता हैं चाँद,

खुली खिड़कियों से कमरे में।

तब हम अक्सर गुफ़्तगू करते हैं चाँद और सितारों से।

वातायन से झाँकता चाँद हँस कर कहता है,

दूरियाँ-नज़दीकियाँ तो मन की बातें है।

कई बार लोग पास हो कर भी पास नहीं होते।

रिश्तों में बस शीतलता, सुकून और शांति होनी चाहिए।

देखो मुझे, जीवन में घटते-बढ़ते तो हम सब रहते हैं।

मुस्कुरा कर सितारों ने कहा हैं-

याद है क्या तुम्हें?

हमें टूटते देख दुनिया अपनी तमन्नाएँ औ ख़्वाहिशें

पूरी होने की दुआएँ माँगती है, हमारा टूटना नहीं देखती।

फिर भी हम टिमटिमाते-खिलखिलाते रहते हैं।

कभी ना कभी सभी टूटते औ आधे-अधूरे होते रहतें हैं।

बस टिमटिमाते रहो, रौशनी और ख़ुशियाँ बाँटते रहो।

क्योंकि सभी मुस्कुराहटों और रौशनी की खोज़ में है।

गुफ़्तगू अपने-आप से

हम सब कई बार टूटते और जुटते हैं। इस दौरान अपने अंदर के हम से हमारी मुलाक़ातें होतीं हैं, बातें होतीं हैं । मुस्कुरा कर मिलते रहो हर दिन अपने आप से। गुफ़्तगू करते रहो अपने आप से। वे पल, वे मुलाक़ातें बहुत कुछ सिखा और मज़बूत बना जायेंगीं।

गुफ़्तगू

तेरे जाने के बाद,

कई बार तेरी ख़ुशबू से

गुफ़्तुगू की है।

ख़्वाबों में आ कर

कई बार जगाया तुमने।

पर यह मिलना भी

कोई मिलना है?