एक ख़्याल

एक ख़्याल अक्सर आता है.

एक रहस्य जानने की हसरत होती है.

क्या सोंच कर ईश्वर ने मुझे इस आकार में ढाला होगा?

कुछ तो उसकी कामना होगी जो यह रूह दे डाला होगा.

क्यों इतने जतन से साँचे में मूर्ति सा गढ़ा होगा?

क्या व्यर्थ कर दिया जाए इसे दुनियावी उलझनों …खेलों में?

या ढूँढे इन गूढ़ प्रश्नों के उत्तरों को,

अस्तित्व के गलने पिघलने से पहले?

बदलाव

उम्र ने बहुत कुछ बदला –

जीवन, अरमान, राहें…….

समय – वक़्त ने भी कसर नहीं छोड़ी –

मौसम बदले, लोग बदले………

मन में यह ख़्याल आता है –

इतना ख़्याल ना करें, इतना याद ना करें किसी को …..

पर आँखे बंद करते –

मन बदल जाता है, ईमान बदल जाते हैं .