खबरें

सब कहते हैं –  प्रकृति  निष्ठुर हो गई है।

पर क़ुदरत से बेरुखी किया हम सब नें ।

कभी सोंचा नहीं यह  क्या कहती है?

 क्यों कहती हैं?

कटते पेङ, मरती नदियाँ आवाज़ें देतीं रहीं। 

जहर बना जल, सागर, गगन। 

हवाएँ कहती रहीं

 अनुकूल बनो या नष्ट हो जाअो…….

अब, पता नही खफ़ा है ? 

 दिल्लगी कर रही है?

या अपने  नियम, कानून, सिद्धांतों पर चल रही है यह ?

खबरें पढ़ कर विचार आता है –

आज हम पढ़तें हैं हङप्पा अौर मोहनजोदाङो,

हजारों साल बाद क्या कोई हमें पढ़ेगा?

 

Happy International Nurses Day 12 May -2020

जाना और पढ़ा फ़्लोरेन्स नाइटिंगेल  /Florence Nightingale का नाम कई बार . पर आज से पहले कभी ध्यान नहीं दिया इस दिन पर. इटली में जन्मीं फ्लोरेंस नाइटिंगेल को आधुनिक नर्सिंग की जनक के तौर पर जाना जाता है।उनके जन्मदिवस के मौके पर अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस मनाया जाता है. आज के कोरोना संकट में नर्सों का योगदान अप्रतिम है.

International Nurses Day is an international day observed around the world on 12 May of each year, to mark the contributions that nurses make to society.

International Nurses Day is organised on 12 May to celebrate the birth anniversary of Florence Nightingale. Each year, the International Council of Nurses (ICN) comes up with a theme to honour nurses. For 2020, the theme chosen for International Nurse Day is ‘Nursing the world to health.’

अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस International Workers’ Day 1 May

अभी मीलों है जाना,

बस चलते जाना है.

भूखेप्यासे चलते जाना है.

पहुँच गए गाँव तब भी सवाल वही है

बिन रोज़गार अब खाएंगे कैसे?

हमारी तो शायद गिनती हीं नहीं हैं.

अगर मर गए कोरोना से तब हम गिनती में तो होंगे.

 

 

International Workers’ Day, also known as Workers’ Day or Labour Day in some countries and often referred to as May Day.

हर साल 1 मई को दुनिया भर में “ अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस“, श्रम दिवस या मई दिवस (International Labour Day) मनाया जाता है। इसे पहली बार 1 मई 1886 को मनाया गया था। भारत में इसे सबसे पहले 1 मई 1923 को मनाया गया था।

दूसरी दीवाली

पहली बार देखा और सुना साल में दो बार दीवाली!

दुःख, दर्द में बजती ताली.

साफ़ होती गंगा, यमुना, सरस्वती और नादियाँ,

स्वच्छ आकाश, शुद्ध वायु,

दूर दिखतीं बर्फ़ से अच्छादित पर्वत चोटियाँ.

यह क़हर है निर्जीव मक्खन से कोरोना का,

या सबक़ है नाराज़ प्रकृति का?

देखें, यह सबक़ कितने दिन टिकता है नादान, स्वार्थी मानवों के बीच.

चीन और चमगादड़ Wet market of China

लोग हो ना हों, हौसले इनके ज़िन्दा हैं.

इतनी जल्दी भूल गए,

वेट बाज़ार- कोरोना कितना बड़ा फंदा है?

अपनी नहीं चिंता अगर,

दुनिया की तो सोचों.

इन चमगादड़, पैंगोलीन, कुत्तों की सोचों…….

ज़िंदगी के रंग -200

  ज़िंदगी बङी  सख़्त और ईमानदार गुरु है.

अलग-अलग तरीक़े से पाठ पढ़ा कर इम्तिहान लेती है…..

और तब तक लेती है,

जब तक सबक़ सीख ना जाओ.

अभी का परीक्षा कुछ नया है.

रिक्त राहें हैं, पर चलना नहीं हैं.

अपने हैं लेकिन मिलना नहीं है.

पास- पड़ोस से घुलना मिलना नहीं है.

इस बार,

अगर सीखने में ग़लती की तब ज़िंदगी पहले की तरह पाठ दुहराएगी नहीं …

और फिर किसी सबक़ को सीखने की ज़रूरत नहीं रह जाएगी.

कोरोना के टेस्ट में फ़ेल होना हीं पास होना है.

पर किसी के पास-पास नहीं होना है.

कायनात और कोरोना

हम सब न जाने कब से धरा, प्रकृति और उसकी व्यवस्था को अस्वीकार कर रहें हैं. उससे खिलवाड़ कर रहें हैं. हम कायनात या इस दुनिया के नियम व तालमेल को रोज़ तोड़ते और भंग करते हैं। धरा, जल, सागर, आकाश, अंतरिक्ष को कचरा से भरते जा रहें हैं.

कभी हम सब ने सोंच नहीं कि प्रकृती हमें रिजेक्ट या अस्वीकार कर दें. तब क्या होगा? आज वही हो रहा है. शायद इस धरा को मानव के अति ने बाध्य कर दिया है. वह अपना राग, नाराज़गी दिखा रही है. कहीं मानव भी विलुप्त ना हो जाए मैमथ, डोडो, डायनासोर की तरह या विलुप्त निएंडरथल – विलुप्त मानव प्रजातियों की तरह. प्रकृति के इस इशारे को संकेत या चेतावनी मान लेने का समय आ गया है. प्रकृति और मानव का सही सामंजस्य अनमोल है. यह समझना ज़रूरी है.