ज़िंदगी का सफ़र

ज़िंदगी के सफ़र में लोग आते हैं।

कुछ दूर कुछ साथ निभाते हैं।

कुछ क़ाफ़िले में शामिल हो

दूर तलक़ जातें हैं।

कुछ मुस्कान और कुछ

आँसुओं के सबब बन जातें हैं।

कुछ ख़्वाबों में बस कर

रह जातें हैं।

रौशनी

जिस रौशनी को

हम खोज रहें हैं।

वह तो है हमारे अंदर।

हम सब हैं,

चमकते-दमकते सितारें

इस ख़ूबसूरत काया

के अंदर।

ध्वनियाँ

ध्वनियाँ मानो तो शोर हैं,

जानो तो संगीत हैं।

नाद साधना हैं।

मंत्र हैं।

ॐ है हर ध्वनि का आधार।

ध्वनियों को ज्ञान से सजा दो,

तो ध्वनियाँ मंत्र कहलातीं हैं।

इन मंत्रों में माधुर्य, सुर,

ताल, लय मिला दो

तो संगीत बन जातीं हैं।

जो रूह में गूंज आध्यात्म

की राहें खोलतीं है।

ब्रह्मांड का हर आयाम

खोलतीं हैं।

ऊपरवाले को पाने का

मार्ग खोलतीं हैं।

तन्हाई

चाँद झुका,

खुले वातायन से

झाँक मुस्कुराया।

बोला, हमें लगता था

हम हीं अकेले दमकते हैं।

यहाँ तो और भी है,

कोई तनहा, तन्हाई

में मुस्कुरा रहा है।

ख़ता

नज़रें झुका कर,

उठा कर,

पलकें झपका

कर अश्कों को क़ाबू

करना सीखा था, पर

आँखें ऐन वक्त पर

धोखा दे गईं।

जब आँखों को आँखें दिखाईं,

जवाब मिला

हमारी नहीं जज़्बातों

की ख़ता है।

कंकर से शंकर

कल तक कंकर था।

तराश कर हीरा बन गया।

कल तक कंकर था।

बहती नर्मदा में ,

तराश कर शंकर बन गया।

तराशे जाने में दर्द है,

चोट है।

पर यह अनमोल बना देता है।

गुफ़्तगू अपने-आप से

हम सब कई बार टूटते और जुटते हैं। इस दौरान अपने अंदर के हम से हमारी मुलाक़ातें होतीं हैं, बातें होतीं हैं । मुस्कुरा कर मिलते रहो हर दिन अपने आप से। गुफ़्तगू करते रहो अपने आप से। वे पल, वे मुलाक़ातें बहुत कुछ सिखा और मज़बूत बना जायेंगीं।

नीड़

पीले पड़ कर झड़ेंगे

या कभी तेज़ हवा का

कोई झोंका ले जाएगा,

मालूम नहीं।

पत्ते सी है चार दिनों

की ज़िंदगी।

पतझड़ आना हीं है।

फिर भी क्या

तिलस्म है ज़िंदगी ।

सब जान कर भी

नीड़ सजाना हीं है।

ज़िंदगी के रंग -226

जब छोटे थे दौड़ते,

गिरते और उठ जाते।

चोट पर खुद हीं

मलहम लगाते थे।

आज़ भी ज़िंदगी की

दौड़ में वही कर रहें हैं।