स्याह रात

जाड़े की सुबह बादलों

से लुकाछुपी खेलती

सुनहरी धूप सरकती,

पैरों तक आ उसे

गुनगुना कर गई।

ख़ुश-गवार, फ़िज़ा परिंदों

की चहचहाहट…. हर सुबह

एक नई रंग ले कर आती है।

स्याह रात के ख़िलाफ़

जंग जीत कर आती है।

ठहराव

तकरार औ इकरार हो,

शिकवे और गिले भी।

पर ठहराव हो, अपनापन,

भरोसा और सम्मान हो,

ग़र निभाने हैं रिश्ते।

वरना पता भी नहीं चलता।

आहिस्ता-आहिस्ता,

बिन आवाज़

बिखर जातें हैं रिश्ते,

टूटे …. शिकस्ते आईनों

की किर्चियों से।

इम्तहान

कई बार लगता है,

ऊपर वाला कुछ

लोगों को ज़िंदगी में

हमारा इम्तहान

लेने भेजता हैं।

जब तक हम अपने लिए

हौसले के साथ खड़ा होना

नहीं सीख लेते।

यह इम्तहान चलता रहता है।

ज़िंदगी के रंग -228

ज़िंदगी रोज़ एक ना एक

सवाल पूछती है।

सवालों के इस पहेली में

उलझ कर, जवाब ढूँढो।

तो ये सवाल बदल देती है।

ज़िंदगी रोज़ इम्तहान लेती है।

एक से पास हो या ना हो।

दूसरा इम्तहान सामने ला देती है।

अगर खुद ना ले इम्तहान,

तो कुछ लोगों को ज़िंदगी में

इम्तहान बना देती है।

बेज़ार हो पूछा ज़िंदगी से –

ऐसा कब तक चलेगा?

बोली ज़िंदगी – यह तुम्हारा

नहीं हमारा स्कूल है।

तब तक चलेगा ,जब तक है जान।

बस दिल लगा कर सीखते रहो।

समुंदर की लहरें

समुंदर की लहरें,

जमीं का ज़ख़्म भरने की

कोशिश में मानो बार बार

आतीं-जातीं रहतीं है।

वक्त भी घाव भरने की

कोशिश करता रहता है।

ग़र चोट ना भर सका,

तब साथ उसके

जीना सिखा देता है।

ज़िंदगी का सफ़र

ज़िंदगी के सफ़र में लोग आते हैं।

कुछ दूर कुछ साथ निभाते हैं।

कुछ क़ाफ़िले में शामिल हो

दूर तलक़ जातें हैं।

कुछ मुस्कान और कुछ

आँसुओं के सबब बन जातें हैं।

कुछ ख़्वाबों में बस कर

रह जातें हैं।

रौशनी

जिस रौशनी को

हम खोज रहें हैं।

वह तो है हमारे अंदर।

हम सब हैं,

चमकते-दमकते सितारें

इस ख़ूबसूरत काया

के अंदर।

ध्वनियाँ

ध्वनियाँ मानो तो शोर हैं,

जानो तो संगीत हैं।

नाद साधना हैं।

मंत्र हैं।

ॐ है हर ध्वनि का आधार।

ध्वनियों को ज्ञान से सजा दो,

तो ध्वनियाँ मंत्र कहलातीं हैं।

इन मंत्रों में माधुर्य, सुर,

ताल, लय मिला दो

तो संगीत बन जातीं हैं।

जो रूह में गूंज आध्यात्म

की राहें खोलतीं है।

ब्रह्मांड का हर आयाम

खोलतीं हैं।

ऊपरवाले को पाने का

मार्ग खोलतीं हैं।

तन्हाई

चाँद झुका,

खुले वातायन से

झाँक मुस्कुराया।

बोला, हमें लगता था

हम हीं अकेले दमकते हैं।

यहाँ तो और भी है,

कोई तनहा, तन्हाई

में मुस्कुरा रहा है।

ख़ता

नज़रें झुका कर,

उठा कर,

पलकें झपका

कर अश्कों को क़ाबू

करना सीखा था, पर

आँखें ऐन वक्त पर

धोखा दे गईं।

जब आँखों को आँखें दिखाईं,

जवाब मिला

हमारी नहीं जज़्बातों

की ख़ता है।