राह के पत्थर

राह के पत्थरों के ठोकरों ने सिखाया,

राह-ए-ज़िंदगी पर चलना।

बुतों का इबादत किया हर दम।

फिर क्यों  फेंक दें इन पाषणों को? ,

सबक तो इन्हों ने  भी दिये कई  बार।

 

 

क्या हाल है?

क्यों,  किसी के  ‘क्या हाल है?’  पूछते

 दर्दे-ए-दिल का हर टांका उधड़ता चला जाता है?

कपड़े के थान सा दिल का हर दर्द,

तह दर तह, अनजाने खुलता चला जाता है।

 यह  सोचे बिना,  इसे समेटेगा कौन?

ख़ता किसकी है?

पूछने वाले के अपनेपन की?

 या पीड़ा भरे दिल की?

 

Image- Aneesh

ऐब-ओ-हुनर

कहते हैं,

वक्त बीतने से  हर दर्द चला जाता है,

अौर हर घाव भर जाता  है।

 पर अनुभव अौर ख्यालात कहतें  है।

ज़िंदगी में मिला दर्द कभी नहीं जाता।

बस उसका रुप बदल जाता है।

कुछ  को अपने दर्द के बाद,

 दूसरों को दर्द देने में मज़ा आता है।

अौर

कुछ लोगों को अपना दर्द ,

दूसरों के दर्द को महसूस करने की समझ दे जाता है.

यह, क्रूरता, पर-पीड़ा

हमदर्दी,  सहानुभूति , संवेदना किसमें में बदलेगा।

यह तो है  इंसान पर,

कि

वो ऐब-ओ-हुनर क्या रखता हैं।

 

अर्थ – 

ऐब-ओ-हुनर –  गुण अौर दोष, कमी  अौर कलात्मकता
aib-o-hunar –vice and virtue, fault and artfulness

हार-जीत

जिंदगी में हार-जीत या

पाना-खोना चलता रहता है।

मैंनें तुम्हें खो दिया है,

अौर अपने-आप को पा लिया।

लेकिन पता नहीं यह जीत है या हार।

 

ज़हन

अर्श….आसमान में चमकते आफ़ताब की तपिश और

महताब की मोम सी चाँदनी

ज़हन को जज़्बाती बना देते हैं.

सूरज और चाँद की

एक दूसरे को पाने की यह जद्दोजहद,

कभी मिलन  नहीं होगा,

यह जान कर भी एक दूसरे को पाने का

ख़्याल  इनके रूह से जाती क्यों नहीं?

 

****

अर्थ – 

अर्श-आसमान।

आफ़ताब- सूरज।

महताब- चाँद।

ज़हन – दिमाग़।

 

पहेलियाँ

हर रोज अपने आस-पास लोगों को पहेलियाँ बुनते देखा है।

वे बोलते कुछ है,  अर्थ कुछ अौर होता है। 

वे चाहते है कि लोग इस रहस्य को समझ जायें।

लेकिन वे भूल जाते हैं।

कैंची जैसी जुबान सारे रिश्ते कतर देती है।

अौर

ना तो  कतरनें पहले जैसी हो सकतीं हैं।

ना  टूटे काँच की  किरचियाँ।

बस चुभन रह जाती है,

अौर रह जाती है टूटते रिश्तों की अनसुनी आवाज़ें।

 

 

Image – Chandni Sahay

नज़्म बना जियेगें ज़िंदगी!

Out beyond ideas of wrongdoing and rightdoing there is a field. I’ll meet you there. When the soul lies down in that grass the world is too full to talk about. ❤  Rumi.

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लम्हों को  गँवाते गँवाते

निकल गई उम्र-ए-रफ़्ता।

गर मिले  फिर इत्तिफ़ाक़ से. 

 नज़्म बना जियेगें ज़िंदगी।

सही-गलत से दूर…मिलेंगे उस जगह….

जहाँ आत्मा,  शरीर के  लिबास में ना हो।

 

 

 

उम्र-ए-रफ़्ता  –  past life,  गुज़री हुई उम्र

ख़ामोश किताबें !!

मौन को सुनो ,  इन  में बला की

 की ताक़त होती है।

 जैसे शब्दों, अल्फ़ाज़ों औ लफ़्ज़ों से भरी 

किताबें   गहरी 

मगर ख़ामोश होती है।

पल-पल

दिलो-दिमाग में  ख़्याल आया।

हर पल में हम ज़िंदगी जीते हैं।

अौर अगले पल वह पल मर जाता है,

बीता हुआ पल बन कर।

फिर, दिलो-दिमाग अौ ज़ेहन में ख़्याल आया,

हर पल ज़िंदगी आगे बढ़ती जा रही है।

 अौर हर पल उम्र घटती जा रही है

पर लालसा अौर लालच बढ़ती जाती है पल-पल।

 मुझे हीं या

औरों को भी यह ख़्याल आता है?

 

 

 

 

ज़ेहन-मस्तिष्क/दिमाग

कई बार जड़ा नाज़ुक आईने को , 

कभी चाँदी, कभी सोने,

कभी पन्नों,  कभी माणिक में।

पर बदला नहीं इस ने कभी अक्स-ए-हकीकत।

हैरान हैं, इस गज़ब की ईमानदारी से।

ऐसे जमाने में.

जब  बिकते हैं सख्त जां लोग भी  लाचारी में।