जिंदगी के रंग -206

कलम थामे

     लिखती उंगलियाँ आगे बढ़ती जातीं हैं।

           तब  एक जीवंत रचना उभरती हैं।

                ये उंगलियाँ संदेश हैं –

                        जिंदगी आगे बढ़ते जाने का नाम है।

                                 आधे पर रुक कर,

पंक्तियोँ…लाइनों को अधूरा छोङ कर,

       लिखे अक्षरों को आँसूअों से धुँधला कर,

                 सृजनशीलता…रचनात्मकता का अस्तित्व संभव नहीं।

                         यही पंक्तियाँ… कहानियाँ… कविताएँ,

                                   पन्नों पर उतर,

                                             आगे बढ़नें  की राहें  बन जातीं हैं। 

 

खुले दरवाजे, शीशे की अजनबी दीवारें, खिड़कियाँ

आसमान छूने की चाहत छोड़,

कैद कर लिया है अपने को,

अपनी जिंदगी को,

खुले दरवाजे और शीशे की कुछ अजनबी दीवारों, खिड़कियों में।

जैसे बंद पड़ी किताबें,

कांच की अलमारी से झांकती हैं अपने को महफ़ुज मान,

पन्नों में अपनी दास्तानों को कैद कर।

अब खाली पन्नों पर,

अपने लफ्ज़ों को उतार

रश्म-ए-रिहाई की नाकाम कोशिश कर रहें हैं।

Painting courtesy- Lily Sahay.