थोड़ी बहुत

इंसानों का यह हाल? बेटियाँ थीं ?

या नाजायज़ थे? भूल क्यों जातें हैं कि इंसान थे।

जब सीखा नहीं थोड़ी बहुत भी इंसानियत,

फिर क्यों जा रहें हैं मंगल और चाँद पर?

धरती हीं काफ़ी नहीं ऐसे मज़ाकों के लिए?

तय है मामले की तहक़ीक़ात के आदेश दिए जाएँगें।

सच्चाई सामने आएगी या बहानें?

जैसे – फ़र्मेंलिन में डूबे स्पेसिमेन।

या किसी निरीह को बकरा बनाएँगे?

समय भी शर्मिंदा होगा,

घड़ों में सौ कौरवों ने जन्म लिया,

आज नालों-बोतलों में जन्म से पहले मौत?

http://कर्नाटकः नाले में तैरते मिले बोतल में बंद 7 भ्रूण, बेलगावी जिले की शर्मनाक घटना

http://7 Aborted Fetuses Sound in Canister in Karnataka in Case of Sex Detection

दर्पण का सच !

जब सच्चा अक्स देखना या दिखाना हो,

 तब आईना याद आता है।

पर सब  भूल जाते हैं दर्पण तो छल करता है।

वह हमेशा उलटी छवि दिखाता है। 

  इंसानों की फितरत भी ऐसी होती है शायद ।

पर अंतर्मन….अपने मन का  आंतरिक दर्पण क्या कहता है?

वह तो कभी छल नहीं करता।

 

A Fire Burns Without Touching Trees Or Grass

कुदरत  से देख बेरुख़ी  इंसानों  की ,
बदले मिजाज धधकते लौ की।
आदत अौर फितरत बदल ली है
 दरिया -ए-आग ने शराफत से ।

Spain – According to local news outlet Cope, it was captured at a park in Calahorra, and the white ‘film’ is actually seeds from the poplar tree covering the whole ground.  In the video, the fire burns away the poplar fluff to reveal green grass underneath. Remarkably enough, it doesn’t set any of the trees or the grass aflame. Even a bench in the park remains untouched by the fire.

चिड़ियों की मीटिंग

अहले सुबह नींद खुली मीठी, गूँजती आवाज़ों से.

देखा बाहर परिंदों की सभा है.

शोर मचाते-बतियाते किसी गम्भीर मुद्दे पर, सभी चिंतित थे

– इन इंसानों को हुआ क्या है?

बड़े शांत हैं? नज़र भी नहीं आते?

कहीं यह तूफ़ान के पहले की शांति तो नहीं?

हाल में पिंजरे से आज़ाद हुए हरियल मिट्ठु तोते ने कहा –

ये सब अपने बनाए कंकरीट के पिंजरों में क़ैद है.

शायद हमारी बद्दुआओं का असर है.