आदत

इक अजीब सी आदत जाती नहीं.

जब भी परेशां होतें हैं-

तुमसे बातें करने की हसरत जागती हैं।

पर मिलोगे कहाँ?

रास्ता और पता मालूम नहीं.

मौसम अौर लोग

किसी को अपनी आदत बनाना ठीक नहीं,

लोगों को मौसम की तरह बदलते देखा है।

गैरों पर भरोसा

अपनी तो आदत थी

गैरों पर भी यकीन करने की।

अपनों ने हीं सिखा दिया शक करना।

गैरों पर भरोसा किया होता,

तब शायद धोखे कम मिले होते..