आज – २२ मार्च, जनता कर्फ़्यू

आज सुबह बॉलकोनी में बैठ कर चिड़ियों की मीठा कलरव सुनाई दिया

आस-पास शोर कोलाहल नहीं.

यह खो जाता था हर दिन हम सब के बनाए शोर में.

आसमान कुछ ज़्यादा नील लगा .

धुआँ-धूल के मटमैलापन से मुक्त .

हवा- फ़िज़ा हल्की और सुहावनी लगी. पेट्रोल-डीज़ल के गंध से आजाद.

दुनिया बड़ी बदली-बदली सहज-सुहावनी, स्वाभाविक लगी.

बड़ी तेज़ी से तरक़्क़ी करने और आगे बढ़ने का बड़ा मोल चुका रहें हैं हम सब,

यह समझ  आया.

बारिश की बूंदें

सारे इत्रों की खुशबू,आज मन्द पड़ गयी…

मिट्टी में बारिश की बूंदे,जो चन्द पड़ गयी…

Unknown

गुमनाम

आज गुमनाम हूँ ,

जरा फासला रख मुझ से।

कल फिर मशहूर हो जाऊँ ,

तब  कोई रिश्ता निकाल लेना।

 

 

Anonymous

ज़िंदगी के रंग – 44

आज

क्या कुछ ख़ास बात है ?

नज़ारे ख़ूबसूरत लग रहे है,

लोग प्यारे लग रहे है,

मौसम ख़ुशगवार सा है

लगता है ……

शायद आज दिल ख़ुश है।

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Life  is a journey not a destination !!!!

 

जीवन  एक यात्रा है,

मंजिल नहीं।

 इस  यात्रा में खुशियाँ   ….बाधाएं…  आती जाती हैं।

यही  जिंदगी हैं।

    इस  लेखन यात्रा  में 

कभी मन की पीङा, कभी खुशियाँ

 आप सबों से बाँटतें बाँटतें  

 तीन साल गुजर गये …. पता हीं नहीं चला।

  आज यह ब्लॉग और मेरे ब्लॉगर मित्र

मेरे  लिये  खजाना  – अनमोल  निधि हैं।

जिंदगी थी खुली किताब

जिंदगी थी खुली किताब,

हवा के झोकों से फङफङाती ।

आज खोजने पर भी खो गये

पन्ने वापस नहीं मिलते।

शायद इसलिये लोग कहते थे-

लिफाफे में बंद कर लो अपनी तमाम जिन्दगी,

खुली किताबों के अक्सर पन्नें उड़ जाया करते है ।