चिड़ियों की मीटिंग

अहले सुबह नींद खुली मीठी, गूँजती आवाज़ों से.

देखा बाहर परिंदों की सभा है.

शोर मचाते-बतियाते किसी गम्भीर मुद्दे पर, सभी चिंतित थे

– इन इंसानों को हुआ क्या है?

बड़े शांत हैं? नज़र भी नहीं आते?

कहीं यह तूफ़ान के पहले की शांति तो नहीं?

हाल में पिंजरे से आज़ाद हुए हरियल मिट्ठु तोते ने कहा –

ये सब अपने बनाए कंकरीट के पिंजरों में क़ैद है.

शायद हमारी बद्दुआओं का असर है.

परिंदे

इन परिंदों की उङान देख,

चहचहाना सुन ,

रश्क होता है।

कितने आज़ाद हैं……

ना बंधन, ना फिक्र  कि …….

कौन सुनेगा ….क्या कहेगा…….

बस है खुली दुनिया अौर आजाद जिंदगी।

बंधन

 

कभी कहीं सुना था –
किसी को बंधनों में बाँधने से अच्छा है, आज़ाद छोङ देना।
अगर अपने हैं ,
अपने आप वापस लौट आएगें।

एक सच्ची बात अौर है –
अगर लौट कर ना आयें, तब भी गम ना करना।
क्योंकि
जगह तो बना कर जा रहें है,
शायद किसी ज्यादा अपने के लिये………..