कई बार जड़ा नाज़ुक आईने को , 

कभी चाँदी, कभी सोने,

कभी पन्नों,  कभी माणिक में।

पर बदला नहीं इस ने कभी अक्स-ए-हकीकत।

हैरान हैं, इस गज़ब की ईमानदारी से।

ऐसे जमाने में.

जब  बिकते हैं सख्त जां लोग भी  लाचारी में।

 

जिंदगी के रंग-188

अपने हों, हवा-ए-फिजा, उड़ता धुँआ या धुंध हो।

जिनके रुख का पता हीं ना हो ,

उन्हें परखने की कोशिश बेकार है ।

क्यों नहीं आज़माना  है, 

तब्सिरा….. समिक्षा करनी है अपनी? 

ईमानदारी से झाँकों अपने अंदर,

या मेरे अंदर…… .आईने ने कहा।

सारे जवाब मिल जायेंगें।

अपने आप को

अपने आप को आईने में ढूँढा,

परछाइयों में अक्सों….

चित्रों में खोजा,

लोगों की भीड़ में ,

किसी की आँखों में खोजा,

यादों में, बातों में खोजा,

भूल गई अपने दिल में झाँकना.

बराबरी की बात

आईने में  अपने प्रतिद्वंद्वी व मित्र को देखा।

जीवन की स्पर्धा, प्रतिस्पर्धा , मुक़ाबला

किसी और से नहीं अपने आप से हो,

तब बात बराबरी की है।

वर्ना क्या पता प्रतियोगी या हम,

कौन ज्यादा सक्षम है?