शाम

चिड़ियों की चहक सहर…सवेरा… ले कर आती है.

 नीड़ को लौटते परिंदे शाम को ख़ुशनुमा बनाते हैं.

ढलते सूरज से रंग उधार लिए सिंदूरी शाम चुपके से ढल जाती.

फिर निकल आता है शाम का सितारा.

पर यादों की वह भीगी शाम उधार हीं रह जाती है,

भीगीं आँखों के साथ.

चमगादड़ और चीन- आओ थोड़ा हँस लें !

शाम के धुँधलके में एक बड़ा चमगादड़,

अपने विशाल पंख फैलाए,

इतराता, उड़ता हुआ ऐसे गुज़रा,

जैसे रातों का राजा हो …..

कहा हमने – बच्चू यहाँ हो इसलिए इतरा रहे हो,

चीन में होते तो सूप के प्याले में मिलते …….

पास के पेड़ पर उलटा लटक कर वह हँसा और बोला-

हम भी कुछ कम तो नहीं.

एक झटके में सारी दुनिया  उलट-पलट दी.

अब चमगादड़ का सूप पीनेवालों को

अपनी छोटी-छोटी पैनी आँखों से चिकेन भी चमगादड़ दिखेगा.

 

 

अपने आप को

अपने आप को आईने में ढूँढा,

परछाइयों में अक्सों….

चित्रों में खोजा,

लोगों की भीड़ में ,

किसी की आँखों में खोजा,

यादों में, बातों में खोजा,

भूल गई अपने दिल में झाँकना.

अँधेरा

समय  चक्र चलता रहता है,

अँधेरा …. अौर फिर उजाला….

कहते हैं –

अँधेरे को उजाला हराता है।

पर अक्सर लगता है –

रात के अँधेरे अनोखे….  अद्भुत…… विचार देते हैं।

शायद

मौन अंधेरा आँखों

की ताकत भी दिलो दिमाग में भर देता है।

शायद

स्वयं को देखने अौर आत्म मंथन

के हालात बना नवल -नये विचारों को जगाता है।

रंग बदलता सूरज

सुबह का ऊगता सूरज,

नीलम से नीले आकाश में,

लगता है जैसे गहरे लाल रंग का माणिक…..रुबी…. हो,

अंगूठी में जङे नगीने की तरह।  

दूसरे पहर में विषमकोण में  कटे हीरे

की तरह आँखों को चौंधियाने लगता है ।

सफेद मोती से दमकते चाँद के आगमन की आगाज़ से

शाम, पश्चिम में अस्त होता रवि रंग बदल फिर

पोखराज – मूंगे के पीले-नारंगी आभा से

रंग देता है सारा आकाश।

रंग बदलते सूरज

की रंगीन रश्मियाँ धरा को चूमती

पन्ने सी हरियाली से 

  समृद्ध करती हैं…

 

image courtesy  google.