ख़ता

नज़रें झुका कर,

उठा कर,

पलकें झपका

कर अश्कों को क़ाबू

करना सीखा था, पर

आँखें ऐन वक्त पर

धोखा दे गईं।

जब आँखों को आँखें दिखाईं,

जवाब मिला

हमारी नहीं जज़्बातों

की ख़ता है।

शिकवे

शिकवे-शिकायतों के लिए यह ज़िंदगी छोटी है,

पर क्या करें, जो कोई रुका नहीं सुनने के लिये…….

वैसे, ज़िंदगी में लुत्फ़ इन शिकायतों का भी है –

चंद क़तरे अश्क़,

अधूरी आरज़ू -हसरतें…..

और ना- उम्मीद शिकायतें….

गिले तो होंगे हीं.