ज़िंदगी के रंग – 210

हाँथों  में खोजते रहे

अरमानों अौ ख़्वाबों की लकीरों को,

और वे लकीरें उभर आईं पेशानी….माथे पर,

अनुभव की सलवटें बन कर।

जिंदगी के रंग – 208

दुनिया में होङ लगी है आगे जाने की…

किसी भी तरह सबसे आगे जाने की। 

कोई ना कोई तो आगे होगा हीं।  

हम आज जहाँ हैं,

वहाँ पहले कोई अौर होगा….. उससे भी पहले कोई अौर।

ज़िंदगी सीधी नहीं एक सर्कल में चलती है। 

जैसे यह दुनिया गोल है।

ज़िंदगी का यह अरमान, ख़्वाब  –

सबसे आगे रहने का, सबसे आगे बढ़ने का……

क्या इस होड़ से अच्छा नहीं  है –

सबसे अच्छा करने का।

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Image courtesy- google.

तारीख़ों में छुपी कहानियाँ

तारीख़ों में छुपी हैं कितनी कहानियाँ.

किसी तारीख़ से जुड़ी होतीं हैं यादें,

किसी से दर्द, किसी से ख़ुशियाँ.

किसी से उम्मीद, आशाएँ और अरमान.

 और कुछ तारीख़ें कब आ कर चली जातीं हैं,

पता हीं नहीं चलता.

आँखें ख़्वाब, औ सपने बुनतीं हैं….

आँखें ख़्वाब, औ सपने बुनतीं हैं,

हम सब बुनते रहते हैं,

ख़ुशियों भरी ज़िंदगी के अरमान।

हमारी तरह हीं बुनकर पंछी तिनके बुन आशियाना बना,

अपना शहर बसा लेता है.

बहती बयार और समय इन्हें बिखेर देते हैं,

यह  बताने के लिये कि… 

 नश्वर है जीवन यह।

मुसाफिर की तरह चलो। 

यहाँ सिर्फ रह जाते हैं शब्द अौर विचार। 

वे कभी मृत नहीं होते।

जैसे एक बुनकर – कबीर के बुने जीवन के अनश्वर गूढ़ संदेश। 

 

 

बुनकर पंछी- Weaver Bird.

जिंदगी के रंग- 193

हम कभी क़ैद होते है ख्वाबों, ख्वाहिशों , ख्यालों, अरमानों में।

कभी होते हैं अपने मन अौर यादों के क़ैद में।

हमारी रूह शरीर में क़ैद होती है।

क्या हम आजाद हैं?

या पूरी जिंदगी ही क़ैद की कहानी है?

 

 

बदलाव

उम्र ने बहुत कुछ बदला –

जीवन, अरमान, राहें…….

समय – वक़्त ने भी कसर नहीं छोड़ी –

मौसम बदले, लोग बदले………

मन में यह ख़्याल आता है –

इतना ख़्याल ना करें, इतना याद ना करें किसी को …..

पर आँखे बंद करते –

मन बदल जाता है, ईमान बदल जाते हैं .

 

 

 

 

सङकें

धूप सेंकते मोटे अजगर सी

बल खाती ये काली अनंत

अंतहीन सड़कें

लगतीं है ज़िंदगी सी ……

ना जाने किस मोड़ पर

कौन सी ख़्वाहिश

मिल जाए .

कभी ज़िंदगी को ख़ुशनुमा बनाए

और कभी उन्हें पूरा करने का

अरमान बोझ बढ़ाए .

गुल्लक अरमानों का

एक था गुल्लक .

अरमानों का.

आधे अधूरे और कुछ पूरे

अरमानों को डालते डालते ,

कब वक़्त गुज़र गया ,

पता नहीं .

जब गुल्लक फूटा….

नज़रों के सामने

बिखरे गये अरमान अनेक .

गुड़िया सजाने ,

पड़ोस के बाग़ से अमरूद चुराने ,

अौर ना जाने कितने सारे अरमान ……

सब पुराने….. बेकार ……

एक्सपायर हो चुके थे .