रौशनी

जिस रौशनी को

हम खोज रहें हैं।

वह तो है हमारे अंदर।

हम सब हैं,

चमकते-दमकते सितारें

इस ख़ूबसूरत काया

के अंदर।

जिंदगी के रंग -205

जीवन में खुश रहने और  सार्थकता ढूंढने में क्या अंतर हैं? 

क्या दोनों साथ-साथ चल सकतें हैं? 

अर्थपूर्णता…सार्थकता के खोज  में अतीत, वर्तमान और भविष्य शामिल होतें हैं।

इसके लिये सही-गलत सीखना पङता है

 खुशियों  के लिये कोई समय, सही-गलत,  कोई शर्त नही होती।

खुशियाँ अपने अंदर होतौं हैं, किसी से मांगनी नहीं पङती है।

सार्थकता जुड़ा है – कर्तव्य,  नैतिकता से।

सार्थकता और अर्थ  खोजने में कभी-कभी  खुशियाँ  पीछे छूट जाती है।

पर जीवन से संतुष्टि के लिये दोनों जरुरी हैं। 

 

 

 

 

खालीपन

अपने अंदर के खालीपन को भरने के लिये

हमने कागज़ पर उकेरे अपने शब्द अौर भाव।

पर धरा का खालीपन कौन भरेगा?

पेङों, घासोँ को काट कागद…कागज़ बनने के बाद?

प्रतिबिंब

ज़िंदगी के अनुभव, दुःख-सुख,

पीड़ा, ख़ुशियाँ व्यर्थ नहीं जातीं हैं.

देखा है हमने.

हाथ के क़लम से कुछ ना भी लिखना हो सफ़ेद काग़ज़ पर.

तब भी,

कभी कभी अनमने हो यूँ हीं पन्ने पर क़लम घसीटते,

बेआकार, बेमतलब सी लकीरें बदल जाती हैं

मन के अंदर से बह निकली स्याही की बूँदों में,

भाव अलंकारों से जड़ी कविता बन.

जिसमें अपना हीं प्रतिबिंब,

अपनी हीं परछाईं झिलमिलाती है.

जिंदगी के रंग-188

अपने हों, हवा-ए-फिजा, उड़ता धुँआ या धुंध हो।

जिनके रुख का पता हीं ना हो ,

उन्हें परखने की कोशिश बेकार है ।

क्यों नहीं आज़माना  है, 

तब्सिरा….. समिक्षा करनी है अपनी? 

ईमानदारी से झाँकों अपने अंदर,

या मेरे अंदर…… .आईने ने कहा।

सारे जवाब मिल जायेंगें।

अंश

कई बार मर- मर कर जीते जीते,
मौत का डर नहीं रहता.
पर किसी के जाने के बाद
अपने अंदर कुछ मर जाता है.
….शायद एक अंश अपना.
वह ज़िंदगी का ना भरने वाला
सबसे बड़ा ज़ख़्म, नासूर  बन जाता है.