तलाश अपनी

तलाश थी अपनी, ढूँढते रहे

दहर…दुनिया के ज़र्रे-ज़र्रे में।

दिल के अंदर से आई आवाज़,

कस्तूरी मृग ना बन,

जो अपनी ही ख़ुशबू खोजता रहता है बाहर।

झाँक अपने अंदर।

हृदय के अंदर, रिक्त आकाश में है

असल तू, तेरा दहर ( शिव या ब्रह्म अंश)।

गुफ़्तगू कर उससे।

आईने सा नज़र आएगा अक्स तेरा।

चिदानंद रूपः शिवोहम शिवोहम!

शब्दार्थ- दहर- दुनिया, दहर – शिव या ब्रह्म अंश

शुभ शिवरात्रि !

Happy Shivratri – I am not the ether, nor the earth, nor the fire, nor the wind (the five elements). I am indeed, That eternal knowing and bliss, the auspicious (Shivam), love and pure consciousness.

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