दिल-ओ-दिमाग़

चोट से टूटे दिल से,

दिमाग़ ने पूछा –

तुम ठीक हो ना?

तुम्हें बुरा नहीं,

ज़्यादा भला होने की

मिली है सज़ा।

ऐसे लोगों की

दुनिया लेती है मज़ा।

पेश नहीं आते दिल से,

दिमाग़ वालों से।

प्यार करो अपने आप से,

मुझ से।

ज़िंदगी सँवर जाएगी।

22 thoughts on “दिल-ओ-दिमाग़

    1. हम हैं दुश्मन
      हम सब
      हम स्वयं

      प्यार में होना
      खुद के लिए
      और दूसरों
      एक भ्रम है

      केवल अंतर्दृष्टि
      कठिन राह पर
      हमारे लिए मददगार हो सकता है

      आंखें
      औरत
      जाँच
      अजनबी
      इससे पहले
      एक महिला एक पुरुष
      गर्मजोशी से स्वागत किया

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      1. Soul is eternal immortal, it’s true but everyone has a name. 😊
        Actually I am working on my phone and unable to open your WP about page. That’s why I asked you.

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  1. मुझे ड्राइव
    आत्मा
    याद में
    अनुमति नहीं दी गई
    चुक होना
    मनचाहा आलिंगन

    दिल की धड़कन में
    हर सांस में
    दर्द

    तेरा चेहरा मुझे हमेशा के लिए छोड़ गया

    ज़ख्म
    जो रोज़ मुझमें जलता है

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  2. इस ख़ुदगर्ज़ और बेदर्द ज़माने में ज़्यादा भला होना तो एक जुर्म बन ही जाता है रेखा जी जिसकी कई बार तो बहुत बड़ी सज़ा भुगतनी पड़ती है एक भले इंसान को। सच पूछिए तो आज की दुनिया में सबसे बड़ा गुनाह ही है – ईमानदारी और शराफ़त। यह दुनिया दिमाग़ वालों की ही है, दिलवालों की नहीं।

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    1. आपने ठीक कहा जितेंद्र जी। पर आदत जाती भी तो नहीं। स्वभाव बदलना आसान नहीं होता। बहुत आभार अपने विचार share करने के लिए।

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