गिरे-बिखरे कुछ लम्हे!

टूट कर गिरे-बिखरे कुछ लम्हे थे,

नज़रों के सामने।

जैसे हवा के झोंके से धरा पर बिखर अाईं,

फूलों की पंखुड़ियों।

कुछ भूले-बिसरे नज़ारें और कुछ यादें ,

जैसे कल की बातें हो।

आज सारे पल,

 अौर  सारी बीतीं घड़ियाँ पुरानी अौर अनजानी लगीं।

ऐसा दस्तूर क्यों बनाया है ऊपर वाले ने?

2 thoughts on “गिरे-बिखरे कुछ लम्हे!

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