दख़्लअंदाज़ी

 

 

 

मेरा नाम लिया या आवाज़ें दीं थीं क्या?

कुछ तो सुना था हमने सुदूर से!

सब कहते हैं, हम खोए  रहते हैं अपने आप में,

इसलिये सुनते रहते हैं अनजानी, अनसुनी आवाज़ें।

मालूम है ना ?

इस “अपने-आप” में तुम भी हो,

रोज़ दख़्लअंदाज़ी करते हो।

 

15 thoughts on “दख़्लअंदाज़ी

      1. This is human nature. You are accustomed to a fragrance of flower and your subconscious mind suddenly feels it’s absence. You feel uneasy. Your parrots call your name and suddenly a silence grips your mind. A vacuum creeps in. Does the life end here? No, it’s the begining of new life. A new fragrance or another parrot calling your name. This is also natural. You lose to know how it feels so that you don’t lose again. Love a life till death sets you apart.

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  1. एक माँ जिसका पुत्र कहीं से भी आता माँ माँ चिल्लाता। माँ सारा काम छोड़ दौड़ पड़ती और उसे गोद में उठा चूमने लगती।पूछती क्या हुआ लाल!
    बेटा कहता , माँ भूख लगी है।
    ये लो बेटा तेरे लिए ही बनाई है।
    आज वह बेटा नही रहा मगर यादें आज भी उसे झकझोरती है।
    बैठे बैठे अचानक दौड़ पड़ती जैसे उनके बेटे ने आवाज दी हो।
    सच है किसी के जाने से जिंदगी नही थमती
    और ये भी सच है की छोड़कर जानेवाले कभी वापस नही आते,
    चाहे वे
    पुत्र हो,प्रेमी हो या कोई और
    मगर उनके बोल कोई बाजार में बिकनेवाला चीज नही जिसे आसानी से बदला जा सके।
    तुम्हें भी बदल पाना मुश्किल,
    अपनेआप में रहते
    मगर तुमसे दूर नही,
    जिंदगी बहुत देखी
    मगर
    इतनी कभी मजबूर नही।

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    1. आपने मेरी कविता का भाव बहुत अच्छे से समझा है. बहुत अच्छी और सही बातें लिखीं हैं.
      यह ज़िंदगी ऐसी हीं होती है. बहुत से रंग दिखाती रहती है.
      बहुत बहुत आभार आपका मधुसूदन !!

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