दूरियाँ और दीवारें

आदत बन रहीं हैं दूरियाँ और दीवारें.

तमाम जगहों पर पसरा है सन्नाटा.

कमरों में क़ैद है ज़िंदगी.

किसी दरवाजे, दीवारों की दरारों से

कभी-कभी रिस आतीं हैं कुछ हँसी….कुछ आवाज़ें.

एक दूसरे का हाथ थामे खड़ी ये चार दीवारें,

 थाम लेतीं हैं हमें भी.

इनसे गुफ़्तुगू करना सुकून देता है.

 

 

5 thoughts on “दूरियाँ और दीवारें

  1. किसी दरवाजे, दीवारों की दरारों से

    कभी-कभी रिस आतीं हैं कुछ हँसी….कुछ आवाज़ें.

    Bahut he kamaal ki lines hai.
    H8gh level thinking.

    ⭐⭐⭐⭐⭐

    Liked by 2 people

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