शिकवे

शिकवे-शिकायतों के लिए यह ज़िंदगी छोटी है,

पर क्या करें, जो कोई रुका नहीं सुनने के लिये…….

वैसे, ज़िंदगी में लुत्फ़ इन शिकायतों का भी है –

चंद क़तरे अश्क़,

अधूरी आरज़ू -हसरतें…..

और ना- उम्मीद शिकायतें….

गिले तो होंगे हीं.

8 thoughts on “शिकवे

  1. बहुत अच्छी बात कही है रेखा जी आपने । इसी संदर्भ में मुझे एक शेर याद आ रहा है :

    तुमने जो दिए ग़म, कोई ग़म नहीं
    हमने किए सितम कुछ कम नहीं
    अब किसी से क्या शिकवा, क्या गिला
    ये तो है मोहब्बत का एक सिलसिला

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    1. लिखनेवाले ने लाजवाब लिखा है. शेर की ये पंक्तियाँ बड़ी सही हैं. इसे शेयर करने के लिए आपका बहुत आभार.

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  2. बहुत बढ़िया।
    चंद क़तरे अश्क़,

    अधूरी आरज़ू -हसरतें…..

    और ना- उम्मीद शिकायतें….

    गिले तो होंगे हीं.

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