ज़िंदगी के रंग- 173

अदबी महफ़िलें, रस्मों -ओ -रवायत

से निभाई जातीं हैं.

हँसी ….मुस्कान …अपनापन

सब कुछ नपा – तौला सा होता है.

जब हमें क़ुदरत ने नवाज़ा है आज़ाद तबियत से.

फिर मुस्कान पे राशन,

गुफ़्तगू में तकल्लुफ़ क्यों ?

बेज़ुबाँ बन, दिखावटी महफ़िलों से अच्छा है,

तन्हाइयों की अपनी महफ़ि

में समय गुज़ारे अपने साथ.

शब्दार्थ–

अदबी- शिष्टाचार .

महफ़िलें- पार्टी.

रस्मों -ओ -रवायत— दस्तूर.

गुफ़्तगू – बातचीत.

तकल्लुफ़ – बनावट, औपचारिकता.

बेज़ुबाँजिसमें बोलने की शक्ति हो.

24 thoughts on “ज़िंदगी के रंग- 173

  1. बहुत अच्छी बात कही है रेखा जी आपने । शायद मैंने पहले भी कभी आपकी किसी पोस्ट पर यह शेर कोट किया था :

    आह…..ये महकी हुई शामें, ये लोगों के हुजूम
    दिल को कुछ बीती हुई तन्हाइयाँ याद आ गईं

    Liked by 2 people

    1. बेहद उम्दा शेर जितेंद्र जी.
      कुछ जलसे , भीड़भाड़ अजनबी लगते हैं. इनसे अच्छी अपनी तन्हाई हीं होती है.

      Liked by 1 person

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s