सूरज तो ढलता है हर रोज़ !!

सूरज तो ढलता है रोज़ .

फिर नियत समय पर निकल आता है.

हौसला ऐसा हीं होना चाहिए .

परेशानियाँ आयें,

उन्हें हौसले व हिम्मत के साथ झेल

और मज़बूती से खड़े हो जाए हम

हर दिन हर रोज़, सूरज जैसा.

वह तो ढलता है हर रोज़ …..

और एक नया सवेरा ले कर आता है.

कविता की अंतिम पंक्ति ब्लोगर गिरिजा के कमेंट से प्रेरित .

22 thoughts on “सूरज तो ढलता है हर रोज़ !!

    1. बहुत अच्छी बात कही तुमने . मैंने इसे अपनी कविता में जोड़ दिया है. आशा है, तुम्हें भी पसंद आएगी .

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  1. सूरज रोज निकलता ढलता
    कहाँ राह में थकता है,
    जीवन भी सूरज के जैसा,
    नित नव राहें गढ़ता है।

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      1. आपकी खूबसूरत पंक्तियाँ पढ़ी कुछ शब्द आये वो लिख दिया। धन्यवाद आपका।

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      1. Sure. Just now I am responding through my phone, my laptop is not with me n to check spam I need laptop.
        I will check n revert, once I go back home.

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  2. हाँ रेखा जी । यही सबक याद रखने में इंसान की भलाई है कि :

    रात भर का है मेहमां अंधेरा
    किसके रोके रूका है सवेरा

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    1. जी , बिलकुल . अपने हौसले को बनाए रखने के लिए यह ज़रूरी है .
      आपका शुक्रिया जितेंद्र जी .

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