फिक्र

अगर तुमने ही ख़बर नहीं तुम्हारी.

तब किसे फिक्र होगी ?

बहते आँसुओं को कौन आता है पहले पोंछने ?

क्या पहले अपनी ही उंगलियां…..

उलटी हथेली नहीं उठती ?

अनजाने में, अपने आप ?

गालों पर बह आए

आँखों को धुँधला कर गए ,

अश्रुओं को हटाने?

करो……..

फ़िक्र करो अपनी .

अपना ख़्याल….अपनी क़द्र करो ,

सिर्फ़ सहानुभूति मत बटोरो ,

तभी लोग भी क़द्र करेंगे !!!

18 thoughts on “फिक्र

  1. सुंदर विचार।।खूबसूरत रचना। कद्र अगर खुद का हम स्वयं नही करेंगे तो कोई और कैसे करेगा।

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