पहचान – कविता #JudgingPeople- poetry

मित्र आगमन पर नंगे पैर दौङ पङे कृष्ण,

ना कान्हा ने सुदामा  को आंका।

ना राम ने सबरी , हनुमान  को नापा।

हम किसी से मिलते हीं सबसे पहले,

एक- दूसरे को  भांपते है, आंकते है,

आलोचना -समालोचना करते हैं।

तभी सामने वाले का मोल तय करते हैं। 

रुप, रंग, अौकात …..

देख कर  लोगों को पहचानते हैं।

भूल जाते हैं , अगर  ऊपरवाला हमारा  मोल लगाने लगेगा,

तब हमारी पहचान क्या होगी ? हमारा मोल क्या होगा? 

Indispose,  Edition 172 –How do you feel when people judge you? Do you judge people as well? #JudgingPeople

image from internet.

34 thoughts on “पहचान – कविता #JudgingPeople- poetry

    1. बिलकुल सही ज्योतिर्मय, तभी तो हम सब ने भी योग्यता, मित्रता, अपनापन के नये मापदंङ बना लिये हैं। आभार !!

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  1. आपकी इस कविता ने स्वर्गीय मुकेश का सदाबहार गीत याद दिला दिया : ‘इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल, जग में रह जाएंगे प्यारे तेरे बोल’ ।

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  2. Bahut sahi kaha Rekha aapne parantu Ram ne bhale hi Sabri aur Hanuman ko na napa ho lekin Sita ko awasya napa hai….napa hi nahi balki unka tiraskar bhi kar diya tha. Agar is udharan ko chhod de to main aapki baki sabhi pehluwon se sehmat hun.

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    1. Aapki baat se mai sahmat hun. Sita ke tiraskaar ko mai kisi tarah justify nahi kar sakti hu. Aur karnaa bhi nahi chahungi.
      Par yahaan mai carchaa kar rahi hun kisi ko dekh kar judge karne ki baat ki.
      Sita -Ram ka yah sambandh pati patni ke bich ke avishvaah ya vishvaash ki baat hai. Jo aaj bhi
      Prasangik hai.
      Aapne apne vichaar share kiye mujhe yah baat achchi lagi. Dhanyvaad Ravish.

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    1. यह हमारे स्वभाव में शामिल हो चुका है। लोगों की काबलियत जाने बिना judge करना शुरू कर देते हैं।

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    1. दरअसल यह topic IB indivine का है . मैने बस कविता लिख दी है. पसंद करने के लिये धन्यवाद .

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  3. बहुत खूब. आजकल इंसानों का स्तर इतना गिरता जा रहा कि मन में उथल-पुथल और वितिष्णा पैदा होती रहती है ।

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    1. आध्यात्म जीवन में इसलिये महत्वपुर्ण है ताकि हमारे अंदर जीवन की समझ आये , व्यक्तित्व में ठहराव और गहराई आये. पर आज इसकी कोई पढाई तो होती नहीँ है.
      इसलिये हम सतही बातों पर ज्यादा ध्यान देने लगे है. कविता पढ़ने और पसंद करने के लिये आभार.

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      1. सहमत. जीवन या आध्यात्म में गहराई अनुभवों से आते हैं । और क्योंकि सबके अनुभव अलग होते हैं इसलिए जरूरी है कि अपने अनुभवों का दायरा भी बढ़ाया जाए बजाय कि सिर्फ सतही बातें दूसरों को सुनाने के लिए बोली जाएँ।

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      2. आप ने अनुभव वाली बात बहुत सही कही है. यह दायरा बढाना ज़रूरी है.
        जिंदगी तो वैसे ही बहुत सी शिक्षा देती रहती है.

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